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’કૃપા’ એટલે આશિર્વાદ અને ’સિંધુ’ એટલે સાગર આ સાગર એટલે જળથી ભરેલો સાગર નહીં પરંતુ આ એ અનાદીઅનંતનો છે જેમનું અસ્તિત્વ વિશ્વ નિર્માણની પહેલા પણ હતું પ્રલય થયા પછી પણ રહેશે. તેથી જ આ સાગર અનંત છે. આ ’પરમાત્મા’, ’સદગુરુ’ છે.


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श्रद्धावानों के फलस्वरूप, उनके जीवन को उचित दिशा प्रदान करने की तीव्र उत्कंठा के फलस्वरूप सदगुरु श्री अनिरुद्ध बापू ने हमें आदिमाता की प्रेमकॄपा का आश्वासन दिया। मां चण्डिका की क्षमा, रक्षण अर्थात आधार, वे इस ग्रंथ के माध्याम से हम तक पहुंचा रहे हैं। श्रद्धावानों के मन मे उठनेवाले सभी प्रश्नों को, भय को दूर करके भक्ती और सामर्थ्य को दृढ करनेवाला यह सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। ऐसा हितकारक बदलाव लानेवाला यह ग्रंथ सिर्फ दिशादर्शक ही नहीं है बल्कि, चण्डिकाकुल की कृपा के फलस्वरूप, इस दिशा में प्रवास करनेवालों को ताकत भी प्रदान करता है। मां चण्डिका की ओर ले जानेवाला मार्ग सदैव खुला रहता है, द्वार खुला रहता है इसका आभास करवानेवाला यह ग्रंथ हमारे अंदर मे अनेको बंद दरवाजो को आसानी से खोल देता है, हमारे मन की अनेक बाधाओं की आसानी से दूर करता है और इस मां की कृपा के खुले मार्ग पर ले आता है। जब ऐसा होता है तब ही मां के नजदीक ले जानेवाले खुले द्वार का आभास होता है और यह कार्य यह ग्रंथ अर्थात सदगुरु की उत्कंठा के शब्द निश्चित रुप से संम्पन्न करता है।


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Shree Shabda Dhyanyog – Marathi – Print Copy (set of 5)


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यह परमपावन कार्य, जैसे इसका नाम दर्शाता है, माँ चंडिका के वात्सल्य का प्रत्यक्षीकरण है। सगुरु श्री अनिरुद्ध रचित यह कार्य भक्तों को केवल महिषासुरमर्दिनी माता चंडिका के आदर्श, कार्य और भूमिका से ही जोड़ने के लिए नहीं है, बल्कि उसके वात्सल्य से और उसकी हमारी संरक्षा के प्रति तत्परता से हमें अवगत कराना है।
वे चाहते हैं कि हम माता के प्रेम को जानें और उस शक्ति को पहचाने – वह शक्ति जो दुष्टता या बुराई से लड़ने की है, वह शक्ति जो नैतिक गुण और भक्ति के परिणामों से निश्चल आनंद की प्राप्ति कराती है। वह भले ही उग्र दिखती हो, वही सच्ची भक्त की सुरक्षा करती है और दुष्टों का नाश करती है। उस ने अपने उद्देश्य के मुताबिक – सच्चाई, पवित्रता, प्रेम और आनंद के नियमों की सुरक्षा हेतु यह भूमिका अपनाई है और वह इसकी प्राप्ति करती ही है।
गायत्री माता, महिषासुरमर्दिनी चंडिका माता और अनसूया माता एक ही है। विभिन्न स्तर के कार्यों के अनुसार माता रूप धारण करती है। जैसा कि सद्गुरु श्री अनिरुद्ध कहते हैं, यह कार्य माता की कीर्तियों का गुणसंकीर्तन है। यह एक ‘ज्ञान-गंगा’ है, और ‘भक्ति-भागीरथी’ है। यह कार्य ज्ञान एवं भक्ति के पथ पर चलकर भगवंत या यहाँ पर माता चंडिका के बोध के प्रति संतोष प्रदान करता है।
यह चिरकाल तक मार्गदर्शन करनेवाला यह ग्रन्थ सद्गुरु श्री अनिरुद्ध जी द्वारा लिखे गए उन के अन्य कार्यों की तरह भक्तों को प्रेम और आधार देता है।


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डॉ. अनिरुद्ध जोशीजी (बापूजी) के हरफनमौला व्यक्तित्व की पहचान करानेवाली, संक्षिप्त में संकलित की गई एक अनोखी पुस्तक – मैंने देखे हुए बापू।


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हे पुस्तक संवेदनशील मनाचं व्यक्तीचं प्रतिबिंब आहे. आजूबाजूच्या दुलर्क्षित केलेल्या घटनांकडे बघून… त्यांचा अंदाज बांधून त्यावर लेखिका आशाताई वाबगावकर यांनी स्वत:चे विचार व्यक्त केले आहेत. अनेक गोष्टींना वेगळ्या नजरेने….वेगळया दृष्टिकोनातून पाहण्याचा अंदाज हा आपल्याला स्पर्शून जातो. एखाद्या गायकाने रागांमधून सुरांचं मंथन आपल्यासमोर पेश करावं त्या अनुभवांच्या संगीताचे राग आळवत त्यांनी आपल्या जगण्याचं मंथन आपल्यासमोर मांडलं आहे अन्‌ हे लिखाण त्यांच्या नावाप्रमाणेच आशादायी आहे, प्रफुल्लित करणारं आहे.


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तीसरा सह्स्त्रक शुरु होते – होते ही अर्थात ११ सितम्बर २००१ से विश्व का हर एक राष्ट्र अपनी अपनी रक्षा एवं भविष्याकालीन राजनीतिक रवैयों का नये से पुनर्विचार करने लगा। विश्व के अधिकतर प्रमुख राष्ट्रों को आतंकवादी चेहेरे की अच्छी खासी पहचान ईससे पूर्व ही हो चुकी थी। अमरिका एवं रशिया ने तो आतंकवादी संगठनों को प्रोत्साहित कर एक दुसरे के खिलाफ़ ऊनका ईस्तेमाल भी किया था।


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‘राम्रसायन’ सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी रचित भगवन श्रीराम की जीवणी है मगर यह केवल अनुवाद नहीं है। ‘राम्रसायन’ भगवान श्रीराम की जीवनगाथा जरुर है, परन्तु कुछ हद तक यह घटनाएं हर युग में और सभी मानवों की जिंदगी में घटती हैं। हरएक की भूमिका – चाहे वे श्रीराम के सद्गुण हों या रावण की चरित्रहीनता हो, वे हर समय हमारे जीवन में घटते हैं। इन बातों को ‘प्रेमप्रवास’ (श्रीमाद्पुरुशार्थ ग्रंथराज का दूसरा भाग) में समझाया गया है। पाठक इन बातों को अपने जीवन से जोड़कर इन से निरंतर मार्गदर्शन पाता है। यह केवल अपनी पत्नी सीता को दुष्ट रावण के चुंगल से छुड़ाने की बात नहीं है। हम भक्तों के लिए मानो भगवान की यह लड़ाई भक्ति को प्रारब्ध के चुंगल से छुड़ाकर वहीँ ले जाने के लिए है जहाँ से वह आई है – भगवान के पास। भगवान एक सामान्य इन्सान की तरह जीवन व्यतीत करते हुए, उपलब्ध भौतिक साधनों की सहायता से और कठिन परिश्रम करते हुए पवित्र मार्ग पर चलकर बुराई पर विजय हासिल करते हैं। यह हमारी प्रेरणा के लिए है। यह पवित्र प्रेम, दृढ विश्वास और हनुमानजी के समर्पण के साथ साथ विपरीत परिस्थितियों में होते हुए बिभीषण के अटूट विश्वास के बारे में है। इस की वजह से यह एक ‘रसायन’ है – यह निरंतर पुनरुद्धार एवं वास्तविक शक्ति का जरिया है। एक ओर, यह हमें वानर सैनिक बनने की प्रेरणा देता है, जो भगवान और राजा श्रीराम के भक्त थे, तो दूसरी ओर सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापूजी कहते हैं कि यह रचना दत्तगुरु के चरणों में अर्पण रामगुणसंकीर्तन की पुष्पांजलि है।
और यही तो इस रचना की सुन्दरता है। इस रचना में चित्र विस्तृत और गूढ़ हैं जो हमें उन घटनाओं की गहराई तक ले जाते हैं मानो वे घटनाएँ हमारे समक्ष, हमारी जिंदगी में घट रही हैं।


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‘सत्यप्रवेश’ श्रीमाद्पुरुषार्थ ग्रंथराज का पहला खंड है और सदगुरु श्रीअनिरुद्ध बापूजी के जीवनकार्य का अनुकरण करके गृहस्तजीवन बिताते हुए परमार्थ प्राप्ति का, अर्थात नरजन्म का सर्वश्रेष्ठ हेतु साधने का मार्ग निर्देशित करता है । यह मार्ग है सामान्य जीवन में भक्ति एवं निष्काम कर्मयोग का, भक्ति एवं सेवा का सहज समावेश, प्रवेश करानेवाला, भगवंत के प्रेम के अहसास को हमेशा जागृत रखनेवाला । इसकी वजह से धैर्य, निर्भयता और पुरुषार्थ के मूल्यों को जीवन में उतारा जा सकता है । यह ग्रंथ भक्ति, पुरुषार्थ का सही और सच्चा अर्थ समझाकर समाज में प्रचलित गलत धारणाएं, अंध विश्वास और भय से मुक्ति दिलाता है तथा खुशहाल और विवेकपूर्ण गृहस्त एवं सामाजिक जीवन बनाता है । ‘सत्यप्रवेश’ एक ऐसे सुन्दर क्षेत्र का द्वार खोलता है जहां भगवान के प्रेम का निरंतर अहसास ही सर्वोच्च सत्य होता है और फिर प्रत्येक श्रद्धावान का इस सुन्दर क्षेत्र में प्रवेश ही ‘सत्यप्रवेश’ बनता है ।


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‘સત્યપ્રવેશ’ ત્રણ ખંડમાંનો પહેલો ભાગ છે. જે સદગુરુ શ્રી અનિરુદ્ધબાપુના મૂળભૂત સિદ્ધાંતોના માર્ગ ઉપર આપણને લઈ જાય છે. માણસને જીવનમાં ઉંચુ ધ્યેય પ્રાપ્ત કરવા માટેનો સહેલો અને સરળ માર્ગ તદ્દન સાદી ભાષામાં આ ગ્રંથમાં બાપુએ રજૂ કર્યો છે. ભક્તિ અને નિષ્કામ કર્મયોગનો માર્ગ.
ભક્તિ અને નિ:સ્વાર્થ સેવાનો માર્ગ. અને બધાથી પર સામર્થ્ય મેળવવાનો માર્ગ કારણકે આ સામર્થ્ય પરમાત્માના આપણા પ્રત્યેના અકારણ કારુણ્યમાંથી જ જન્મે છે. સમાજમાં ફેલાયેલી અંધશ્રદ્ધા, ભય તેમજ ખોટી માન્યતાઓને જડમૂળમાંથી ઉખાડીને લોકોને સાચી ભક્તિ અને અધ્યાત્મની સમજ આપવી તેમજ પ્રગતિ અને આનંદનો માર્ગ કેટલો સહજ અને સહેલો છે એ સમજાવવાનું કાર્ય આ ગ્રંથ કરે છે.
‘સત્યપ્રવેશ’ એક સુંદર પ્રદેશમાં આપણને પ્રવેશ કરાવવા માટેનો રાજમાર્ગ ખુલ્લો કરે છે. જીવનનું જે મૂળભૂત સત્ય છે કે પરમાત્મા આપણને ખૂબ જ પ્રેમ કરે છે અને હંમેશા આપણી સાથે જ હોય છે એ માટેની જાગૃતતા આપણામાં લાવવાનુ કાર્ય કરે છે. ‘સત્યપ્રવેશ’ એટલે એક સુંદર જીવનમાં પ્રવેશવાનો રાજમાર્ગ છે જે દરેક શ્રદ્ધાવાન માટે બાપુએ ખૂલ્લો કર્યો છે.


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प्रत्येक जीव की, बल्कि इस समूचे विश्व की यात्रा…………यह विश्व जिस से निर्माण हुआ, जिस ही में इसका लय होता है, ‘वही’ एकमात्र अंतिम सत्य, प्रेम का मूल स्रोत है, और आनंद का भी । मानवजीवन का सर्वोच्च हेतु भी वो ही – भगवंत है । इस भगवंत की दिशा में गति करना यह यात्रा है और भगवंत – सदगुरु-परमात्मा अपना ध्येय । अपनी यह यात्रा भगवंत के ही प्रेम से प्रेरित होने से वह आनंदमय और परिपूर्ण होती है । यह प्रेम ही सामर्थ्यदाई, पुरुषार्थ और निर्भयता देता है । भगवंत के प्रेम का अहसास यात्रा को भक्तिमार्ग पर दृढ करता है । ‘प्रेमप्रवास’ ग्रंथ एक ऐसे ही सुन्दर यात्रा का आश्वासन है क्योंकि प्रत्येक की यात्रा भगवंत की (प्रेम) दिशा में और भगवंत के (प्रेम) सहवास में ही करनी होती है । यह यात्रा प्रत्येक के जीवन में कैसे घट सकती है और उसके लिए कौनसे प्रयास घटने होते हैं यह सदगुरु श्रीअनिरुद्ध बापूजी सहज-सरल शब्दों में हमें समझाते हैं । ‘पूर्वरंग’ में यह भगवंत कैसा अनंत, अपार है यह हम समझ लेते हैं। ‘श्रीरंग’ में इस अनंत भगवंत का बिलकुल हर जीव पर असीम प्रेम होता ही है, ताकि हम उसके पास जाएँ। भक्ति बढ़ने के लिए कौनसे प्रयास करने चाहिएं इस बात को हम जान लेते हैं – अपना विकास होने के लिए आहार में बदलाव करने से लेकर जीवन में समय के, कार्य के नियोजन के बारे में भी मार्गदर्शन किया गया है । ‘मधुफलवाटिका’ यह तीसरा विभाग वानरवीरों का विश्रम्स्थान है जहाँ के फल ओज, सामर्थ्य तथा निश्चितरूप से आनंद प्रदान करते हैं । अर्थात, सदगुरु श्रीअनिरुद्धबापू जिस श्रीमद्पुरुषार्थ को जीस ‘मधु’ की मिसाल देते हैं वैसी ही औषधि एवं मधुरता से परिपूर्ण है ।


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૧૯૨૫ની સાલના દશેરાના શુભદિને રાષ્ટ્રીય સ્વયંસેવક સંઘ ની સ્થાપના થઈ. ડૉ. કેશવ બળીરામ હેડગેવારજીએ નેવું વર્ષ પૂર્વે જેનું બીજારોપણ કરેલું એ વટવૃક્ષની આજે કેટકેટલી શાખાઓ વિસ્તરી છે, એના જે વિધવિધ પર્ણો પલ્લવિત થયાં છે એની ગણતરી કરવી કઠિન છે. પરંતુ આજે ભારતીય જનમાનસમાં આ સંગઠનના મૂળ ઊંડે સુધી વિસ્તરેલાં છે અને એ પણ સમર્થ અને સશક્તપણે અને આજે આ સંગઠન વટવૃક્ષની ગતિ અને શૈલી પ્રમાણે વિકાસ કરી રહ્યું છે. આ સંગઠનનો પ્રસાર માત્ર ભારત પૂરતો જ મર્યાદિત નથી રહ્યો પણ પરદેશમાં સુધ્ધાં જે જે સ્થળે ભારતીય વસેલ છે ત્યાં ત્યાં એની છાયા વિસ્તરી છે. સંઘની વિદેશમાંની શાખાઓ વિદેશવાસી ભારતીયોને પોતાની માતૃભૂમિ સાથે, મૂળભૂત સંસ્કૃતિ સાથે મજબૂત રીતે સાંકળી રાખનારી એક કડીરુપ છે. રાષ્ટ્રીય સ્વયંસેવક સંઘ એક સંસ્થા માત્ર નથી, એ સ્વદેશ સાથે સંયોજન કરનારી જીવનદોર છે! પરંપરા છે!


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गेली अनेक वर्षे ’भारतीय प्राचीन बलविद्ये’ चे संशोधक- मार्गदर्शक व तज्ञ प्रशिक्षक म्हणून डॉ. अनिरूध्द धैर्यधर जोशी (अनिरूध्द बापू) (एम.डी.- मेडिसिन) कार्य करित आहेत. एक यशस्वी र्‍ह्युमॅटोलॉजिस्ट असलेल्या डॉ. अनिरूध्दांनी आपल्या अनेक वर्षांच्या व्यासंगाने संपादित केलेले भारतीय प्राचीन बलविद्येचे प्रकार त्यांनी आता सर्वांकरिता खुले केले आहेत. ’भारतीय प्राचीन बलविद्या’ हा विषय त्याच्या नावावरुन गूढ वटतो, ज्याचे कुतूहल व आकर्षण शतकानुशतके विदेशी लोकांनाही वाटत आले आहे. जोपर्यंत ही भारतीय प्राचीन बलविद्या आपल्या देशात आदर केला जात होता तोपर्यंत भारतदेशही वैभवाच्या शिखरावर होता. ह्या देशातील तरुणांना ह्या प्राचीन बलविद्येचे प्रशिक्षण जात्याच मिळत असल्यामुळे देशाकडे वाकड्या नजरेने बघण्याची कोण्त्याही शत्रुदेशाची हिंमत नव्ह्ती. पुढे कालौघात ह्या बलविद्यांचे आमच्या देशातील महत्व कमी कमी होऊन त्या हळूहळू लोप पावल्या अ त्यानंतर भारतदेश विदेशी आक्रमकांच्या तावडीत गेला. आज त्याच लोप पावलेल्या भारतीय प्राचीन बलविद्येचे प्रथम आचार्य रविंद्रसिंह मांजरेकर ह्यांना बापूंनी ही सर्व भारतीय प्राचीन बलविद्या स्वत: शिकवली. आता डॉ. अनिरूध्दांच्या मार्गदर्शनाखाली व आचार्य रविंद्रसिंहांच्या प्रत्यक्ष देखरेखीखाली ह्या भारतीय प्राचीन बलविद्याचे प्रशिक्षणवर्ग चालवले जातात. डॉ. अनिरूध्दांनी आचार्य रविंद्रसिंहांना दिलेल्या प्रशिक्षणवरुन व ह्या प्रशिक्षणवर्गात शिकवल्या जाणार्‍या बलविद्येच्या प्रकारांवरुन हे पुस्तक (टेक्स्टबुक) संकलित करण्यात आलेले आहे.