Shreemad Pursharth Granthraj – Prempravas Standard Edition (Hindi)

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प्रत्येक जीव की, बल्कि इस समूचे विश्व की यात्रा…………यह विश्व जिस से निर्माण हुआ, जिस ही में इसका लय होता है, ‘वही’ एकमात्र अंतिम सत्य, प्रेम का मूल स्रोत है, और आनंद का भी । मानवजीवन का सर्वोच्च हेतु भी वो ही – भगवंत है । इस भगवंत की दिशा में गति करना यह यात्रा है और भगवंत – सदगुरु-परमात्मा अपना ध्येय । अपनी यह यात्रा भगवंत के ही प्रेम से प्रेरित होने से वह आनंदमय और परिपूर्ण होती है । यह प्रेम ही सामर्थ्यदाई, पुरुषार्थ और निर्भयता देता है । भगवंत के प्रेम का अहसास यात्रा को भक्तिमार्ग पर दृढ करता है । ‘प्रेमप्रवास’ ग्रंथ एक ऐसे ही सुन्दर यात्रा का आश्वासन है क्योंकि प्रत्येक की यात्रा भगवंत की (प्रेम) दिशा में और भगवंत के (प्रेम) सहवास में ही करनी होती है । यह यात्रा प्रत्येक के जीवन में कैसे घट सकती है और उसके लिए कौनसे प्रयास घटने होते हैं यह सदगुरु श्रीअनिरुद्ध बापूजी सहज-सरल शब्दों में हमें समझाते हैं । ‘पूर्वरंग’ में यह भगवंत कैसा अनंत, अपार है यह हम समझ लेते हैं। ‘श्रीरंग’ में इस अनंत भगवंत का बिलकुल हर जीव पर असीम प्रेम होता ही है, ताकि हम उसके पास जाएँ। भक्ति बढ़ने के लिए कौनसे प्रयास करने चाहिएं इस बात को हम जान लेते हैं – अपना विकास होने के लिए आहार में बदलाव करने से लेकर जीवन में समय के, कार्य के नियोजन के बारे में भी मार्गदर्शन किया गया है । ‘मधुफलवाटिका’ यह तीसरा विभाग वानरवीरों का विश्रम्स्थान है जहाँ के फल ओज, सामर्थ्य तथा निश्चितरूप से आनंद प्रदान करते हैं । अर्थात, सदगुरु श्रीअनिरुद्धबापू जिस श्रीमद्पुरुषार्थ को जीस ‘मधु’ की मिसाल देते हैं वैसी ही औषधि एवं मधुरता से परिपूर्ण है ।

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